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Friday, 9 March 2012

चश्मा

जब भी मैं चश्मा उतार देखता हूँ,
धुंधला-धुंधला सा सब दिखता है,
घिलमिल-घिलमिल,
ओझल-ओझल,
एक दूजे से मिला-मिला,
धरा ताल,
तार-तार,
जैसे मोतियों का बिखरा हार,
जुदा-जुदा, फिर भी,
मोती-मोती बातें करता,
संग चलता,
एक मुस्कान साथ भरता,
एक हो जैसे सब,

शख्श-शख्श,
गाड़ियां सड़क पे दौड़ती हुई,
आसमान में पतंगे उडती हुई,
और वो हवाई जहाज, कहीं जाता हुआ,

दूर की वो ईमारत, पास का ये बंगला,
ऊँचा सा पेड़, छोटा सा वो, पौधे का गमला,

एक जैसी, एक सी दुनिया, एक ही दुनिया,

फिर मैं चश्मा पहन लेता हूँ,
हज़ारों दुनिया देखता हूँ,
अपनी दुनिया में आ जाता हूँ,